कौवों के शहर में...
आशुतोष तिवारी
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
काँव-काँव में निकल जाता है दिन,
और रात को चैन की नींद नहीं आती...
किसी लाश के लोथड़े को, दांतों में बंद कर,
लेकर पहुच जाते हैं, मंदिर-मस्जिद के गुम्बद पर...
नोचा-नोची में एक से सौ हों जाते,
और उस उंचाई तक हमारी नज़र नहीं जाती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
कहाँ-कहाँ कूदा, किस-किस जगह गिराया,
दो बूंद खून का, जो था कही से लाया...
कितने मुह में लगे है दाग? एक लाश के रहम से,
फिर भी कही से देखे, अब बदबू नहीं आती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
बहुतों पर गिरी हड्डियां, बहुतों पर पड़े छीटे,
किसी ने कौवे को ऊपर घुरा, डाली नज़र, किसी ने निचे..
खैर, उस वक़्त जो पहल सब मिल कर किये होते,
मिट जाते दाग कच्चे, न कपड़ों की सूरत ख़राब होती....
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
आशुतोष तिवारी
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
काँव-काँव में निकल जाता है दिन,
और रात को चैन की नींद नहीं आती...
किसी लाश के लोथड़े को, दांतों में बंद कर,
लेकर पहुच जाते हैं, मंदिर-मस्जिद के गुम्बद पर...
नोचा-नोची में एक से सौ हों जाते,
और उस उंचाई तक हमारी नज़र नहीं जाती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
कहाँ-कहाँ कूदा, किस-किस जगह गिराया,
दो बूंद खून का, जो था कही से लाया...
कितने मुह में लगे है दाग? एक लाश के रहम से,
फिर भी कही से देखे, अब बदबू नहीं आती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
बहुतों पर गिरी हड्डियां, बहुतों पर पड़े छीटे,
किसी ने कौवे को ऊपर घुरा, डाली नज़र, किसी ने निचे..
खैर, उस वक़्त जो पहल सब मिल कर किये होते,
मिट जाते दाग कच्चे, न कपड़ों की सूरत ख़राब होती....
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...