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| तुम्हारे लिए |
बरसों बाद जब वो बुँदे सुख गईं, तब मुझे एहसास हुआ की उन दो बूंदों ने मेरे मन में समंदर का रूप ले लिया है, जिन्हें मैं चाह कर भी नहीं मिटा सकता। उन दो बूंदों में सब कुछ तो था, एक ख्वाहिश थी, एक सफ़र था जिसमे रौशनी और हवा ने भी साथ दिया, एक ज़मीं भी थी, मेरे हाथो की, आखिर कैसे ये बुँदे सिर्फ बुँदे रह पाती।
कुछ दिनों पहले मै यूँ ही परेशान था, आँधियों का सिलसिला समंदर में बेवजह तूफान पैदा कर रहा था। मै डर गया, की आखिर कब तक इस समंदर को कैद रख पाउँगा। बहुत सोचा फिर तुम्हारी कही हुई एक बात याद आ गई "तुम ना, रोना मत कभी, तुम्हारी आँखों से मोती नहीं मदिरा (वास्तव में तुमने दारु कहा था :) ) टपकती हैं, आसपास बेवड़ो की लाईन लग जायेगी"।
फिर मैंने सोचा, क्यों ना इस समंदर से वक़्त बेवक़्त दो प्याले भर कर दुनिया को पिलाता रहूँ। तुम्हारी आँखों का ख्वाब दुनिया को बांटता चलूँ। अपनी गलतियों के पन्नों पर, तुम्हारे आँसुओं को एहसास और मुस्कराहट को शब्द बनाकर लिखता रहूँ।
बहुत दिन हो गए, लेकिन अब तक कुछ नहीं बदला।ना मेरा इंतज़ार, ना तुम्हारे ख्वाबो के मोती... मुझे तो बस उस वक़्त का इंतज़ार है, जब मेरे मन में सिर्फ वो दो बुँदे रह जाएँगी, जिन्हें मैंने तुम्हारी आँखों से टपकते देखा था, वास्तव में वो दो बुँदे ही मेरे लिए थी, ये समंदर तो दुनिया के लिए है।।
