सर्वज्ञानी का विद्रोह
आशुतोष तिवारी
भोपाल से चालीस किलोमीटर दूर मेरा गाँव है, ”ज्ञानपुर”! मेरे गाँव में सन 1947 के बाद सिर्फ दो तरह के ही लोग पैदा हुए!एक महाज्ञानी एक सर्वज्ञानी, हलाकि महाज्ञानी लोगों को गाँव में अछि प्रतिष्ठा हासिल नहीं थी, इसलिए वो गाँव से पलायन कर गए और दिल्ली, आगरा, इंदौर जैसे शहरों में अपनी पत्रकारिता की दूकान खोल ली, आज भी इन शहरो की आधी से ज्यादा जनसख्या हमारे गाँव वालों की ही है, जो रिश्ते में मेरे चाचा, मामा, भाई या भतीजे लगते है! भाई, चाचा की लिखी पुस्तकों का तार्किक अध्यन कर के नए सिरे से लिखता है और भतीजा, भाई की लिखी हुई किताबों की समीक्षा कर, किसी जाने माने नेता से विमोचन करवाता है! ले दे के किताबें वही है, आज़ादी के पहले वाली, जो अंग्रेजो की कलम से, उनकी हवेलियों में, विदेशी शराब और बालाओं को चुमते हुए ज्ञानपुर के अखंड ज्ञानियों ने लिखी थी!
गाँव की बागडोर सर्वज्ञानी लोगों के हाथ में रह गई, जो न ईश्वर को मानते थे, न मनुष्य को! उनकी नज़र में सब बराबर थे! इश्वर, मनुष्य, जानवर! और सबसे दिलचस्प बात ये थी, की इन तीनो को नियंत्रित करने का अधिकार सिर्फ मनुष्य को था! वो ईश्वर को भी कंट्रोल करते थे और जानवर को भी कंट्रोल करते थे और सर्वज्ञानी होने की वजह से महाज्ञानी और अल्पज्ञानी मनुष्यों पर भी नियंत्रण रखते थे!
सर्वज्ञानी खानदान की नीवं सन 1850 में श्री ज्ञानेश्वर शुक्ल ने रखी थी! जिनकी मान्यता ये थी की संसार में सिर्फ ज्ञानी हैं या मूढ़! इसलिए हर बात को तर्क की कसौटी पर कसे बिना नहीं माना जा सकता, और तर्क की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सबसे आवश्यक था, की उनके द्वारा खिची हुई चिल्लम, के धुएं को पार करना! धुएं के एक तरफ उनके चेले-चपाटी रहते, जो धुएं की सुगंध से ही तीनो लोकों का दर्शन कर आते, और धुएं की दूसरी तरफ होते अल्पज्ञानी या मूढ़ जिन्हें धुएं का असर ऐसा होता की वो अपनी वास्तविक बात भूलकर धुएं के क्षेत्र में ही घुमते हुए नतमस्तक हो जाते!
धुएं की खुशबु और खानदान की नीवं रखने के बोध ने उन्हें विद्रोही प्रवृति का बना दिया! समय बदला, ज्ञान बदला, गाँव बदला, सरकार बदली लेकिन सर्वज्ञानी परिवार के लोग न बदले! आज भी ज्ञानपुर में देश के किसी हिस्से से लाये गए अखबार, पत्रिका या अन्य लेख मान्य नहीं है! गलती से अगर प्रकाशक, लेखक, या विमोचक “महाज्ञानी” कुल का हुआ (यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित रहेगा, की जिस सर्वज्ञानी कुल के लड़के या लड़की ने महाज्ञानीयों के घर विवाह किया उनका कुल भी महाज्ञानी ही माना जाता है.. यानी की सर्वज्ञानियों की दृष्टि में अछूत)तो उस पुस्तक को ज्ञानपुर में लाना एक हत्या के बराबर माना जाता है!
आज सर्वज्ञानी परिवार की बागडोर किशोरज्ञान शुक्ल के हाथो में है! जिनके कहे हुए शब्द ज्ञानपुर के लोग सुने बिना ही स्वीकार कर लेते है!
इस बार घर जाते समय मै भूलवश अपने साथ एक अखबार लेता गया! मुझे याद ही नहीं रहा की मेरे गाँव में इसकी सजा के तौर पर मुझे अछूत घोषित किया जा सकता है! खैर शाम को घर पंहुचा, खाना खाया और लेट गया! सुबह आँख खुली तो घर के बाहर हंगामा हो रहा था! मै समझ नहीं पाया की आखिर क्या हो गया, उत्सुकतावश बाहर निकला तो देखा, की किशोरज्ञान चाचा, मेरे पिताजी से उलझे हुए थे!
मैंने किशोर ज्ञान जी से पूछा “आखिर माजरा क्या है?”
तो उनके अन्दर का सर्वज्ञानी खून खौल गया! मेरे हाथो में अखबार थमाते हुए बोले!”ये क्या है”?
अचानक ही मेरे मष्तिस्क में मेरे कुकर्म का बोध हो गया! मैंने उनसे माफ़ी मांगी, लेकिन वो गुस्से में मेरी बात सुने बिना बोले जा रहे थे, आखिर में पिता जी ने मेरे हाथो में अखबार थमाया और उन शब्दों को दिखाया जो सर्वज्ञानी खानदान को नागवार गुजरा था!!
अखबार 26 मई 2014 का था और शीर्षक था!”देश की हवा बदली”! और इस लेख को लिखा था! महाज्ञानी परिवार के एक अल्पज्ञानी ने! भला देश की हवा एक अछूत कुल का महाज्ञानी कैसे बदल सकता है?
मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ! मेरी तरफ से पिताजी ने भी माफ़ी मांग ली, लेकिन किशोर चाचा नहीं माने, रट लगाये रहे “एक महाज्ञानी की वजह से देश की हवा कैसे बदल सकती है?”
उन्होंने खाना पीना त्याग दिया, लोगो से बात करना बंद कर दिया और मैने अपराधबोध में घर से धीरे धीरे निकलना ही बंद कर दिया!!
मुझे अगले दिन दिल्ली वापस जाना था, पिताजी ने कहा “जाओ किशोर चाचा से मिल आओ, हलाकि उन्होंने कल से खाना पीना शुरू कर दिया है, लेकिन शरीर काफी दुर्बल हो गया है, और अपनी प्रवृति के मुताबिक उन्होंने विद्रोह का एक नया तरीका इजाद किया है”
मै उन्हें नहीं मिलना चाहता था, लेकिन आत्मग्लानि के बोझ और उनके विद्रोह के नए तरीके को जानने की इक्षा ने, मेरे कदमो को उनके घर की तरफ मोड़ दिया, धीरे धीरे चलते हुए मै उनके घर तक पंहुचा और मेरी आँखे खुली की खुली रह गई!
“ज्ञानपुर के सर्वज्ञानी कुल के किशोरज्ञान शुक्ल, धोती पहने अपनी खाट पर पश्चिम दिशा की तरफ सर किये हुए लेटे हुए थे” , हवा पूरब से चल रही थी, और उनकी धोती हवा में लहरा कर अपने विद्रोही मालिक का गुणगान कर रही थी! स्वभाव से विद्रोही चाचा अपना विद्रोह कर रहे थे! आसपास उनके चेले-चपाटी “ज्ञान सर्वत्र है" का नारा लगा रहे थे! चारो तरफ धुँआ ही धुँआ...
खैर अब तो मै दिल्ली आ चूका हूँ, लेकिन अगर आप “ज्ञानपुर” जाएँ, तो किशोर जी के दर्शन जरुर करें! शायद हवा ने अपना रुख बदल लिया हो? या धोती को अपने मालिक का ख्याल आ गया हो ? या सर्वज्ञानी कुल के होनहार बच्चों या चेलों ने उनकी खाट के पास, हमेशा के लिए पंखो का इन्तेजाम ही कर दिया हो...!!!
आशुतोष तिवारी
भोपाल से चालीस किलोमीटर दूर मेरा गाँव है, ”ज्ञानपुर”! मेरे गाँव में सन 1947 के बाद सिर्फ दो तरह के ही लोग पैदा हुए!एक महाज्ञानी एक सर्वज्ञानी, हलाकि महाज्ञानी लोगों को गाँव में अछि प्रतिष्ठा हासिल नहीं थी, इसलिए वो गाँव से पलायन कर गए और दिल्ली, आगरा, इंदौर जैसे शहरों में अपनी पत्रकारिता की दूकान खोल ली, आज भी इन शहरो की आधी से ज्यादा जनसख्या हमारे गाँव वालों की ही है, जो रिश्ते में मेरे चाचा, मामा, भाई या भतीजे लगते है! भाई, चाचा की लिखी पुस्तकों का तार्किक अध्यन कर के नए सिरे से लिखता है और भतीजा, भाई की लिखी हुई किताबों की समीक्षा कर, किसी जाने माने नेता से विमोचन करवाता है! ले दे के किताबें वही है, आज़ादी के पहले वाली, जो अंग्रेजो की कलम से, उनकी हवेलियों में, विदेशी शराब और बालाओं को चुमते हुए ज्ञानपुर के अखंड ज्ञानियों ने लिखी थी!
गाँव की बागडोर सर्वज्ञानी लोगों के हाथ में रह गई, जो न ईश्वर को मानते थे, न मनुष्य को! उनकी नज़र में सब बराबर थे! इश्वर, मनुष्य, जानवर! और सबसे दिलचस्प बात ये थी, की इन तीनो को नियंत्रित करने का अधिकार सिर्फ मनुष्य को था! वो ईश्वर को भी कंट्रोल करते थे और जानवर को भी कंट्रोल करते थे और सर्वज्ञानी होने की वजह से महाज्ञानी और अल्पज्ञानी मनुष्यों पर भी नियंत्रण रखते थे!
सर्वज्ञानी खानदान की नीवं सन 1850 में श्री ज्ञानेश्वर शुक्ल ने रखी थी! जिनकी मान्यता ये थी की संसार में सिर्फ ज्ञानी हैं या मूढ़! इसलिए हर बात को तर्क की कसौटी पर कसे बिना नहीं माना जा सकता, और तर्क की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सबसे आवश्यक था, की उनके द्वारा खिची हुई चिल्लम, के धुएं को पार करना! धुएं के एक तरफ उनके चेले-चपाटी रहते, जो धुएं की सुगंध से ही तीनो लोकों का दर्शन कर आते, और धुएं की दूसरी तरफ होते अल्पज्ञानी या मूढ़ जिन्हें धुएं का असर ऐसा होता की वो अपनी वास्तविक बात भूलकर धुएं के क्षेत्र में ही घुमते हुए नतमस्तक हो जाते!
धुएं की खुशबु और खानदान की नीवं रखने के बोध ने उन्हें विद्रोही प्रवृति का बना दिया! समय बदला, ज्ञान बदला, गाँव बदला, सरकार बदली लेकिन सर्वज्ञानी परिवार के लोग न बदले! आज भी ज्ञानपुर में देश के किसी हिस्से से लाये गए अखबार, पत्रिका या अन्य लेख मान्य नहीं है! गलती से अगर प्रकाशक, लेखक, या विमोचक “महाज्ञानी” कुल का हुआ (यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित रहेगा, की जिस सर्वज्ञानी कुल के लड़के या लड़की ने महाज्ञानीयों के घर विवाह किया उनका कुल भी महाज्ञानी ही माना जाता है.. यानी की सर्वज्ञानियों की दृष्टि में अछूत)तो उस पुस्तक को ज्ञानपुर में लाना एक हत्या के बराबर माना जाता है!
आज सर्वज्ञानी परिवार की बागडोर किशोरज्ञान शुक्ल के हाथो में है! जिनके कहे हुए शब्द ज्ञानपुर के लोग सुने बिना ही स्वीकार कर लेते है!
इस बार घर जाते समय मै भूलवश अपने साथ एक अखबार लेता गया! मुझे याद ही नहीं रहा की मेरे गाँव में इसकी सजा के तौर पर मुझे अछूत घोषित किया जा सकता है! खैर शाम को घर पंहुचा, खाना खाया और लेट गया! सुबह आँख खुली तो घर के बाहर हंगामा हो रहा था! मै समझ नहीं पाया की आखिर क्या हो गया, उत्सुकतावश बाहर निकला तो देखा, की किशोरज्ञान चाचा, मेरे पिताजी से उलझे हुए थे!
मैंने किशोर ज्ञान जी से पूछा “आखिर माजरा क्या है?”
तो उनके अन्दर का सर्वज्ञानी खून खौल गया! मेरे हाथो में अखबार थमाते हुए बोले!”ये क्या है”?
अचानक ही मेरे मष्तिस्क में मेरे कुकर्म का बोध हो गया! मैंने उनसे माफ़ी मांगी, लेकिन वो गुस्से में मेरी बात सुने बिना बोले जा रहे थे, आखिर में पिता जी ने मेरे हाथो में अखबार थमाया और उन शब्दों को दिखाया जो सर्वज्ञानी खानदान को नागवार गुजरा था!!
अखबार 26 मई 2014 का था और शीर्षक था!”देश की हवा बदली”! और इस लेख को लिखा था! महाज्ञानी परिवार के एक अल्पज्ञानी ने! भला देश की हवा एक अछूत कुल का महाज्ञानी कैसे बदल सकता है?
मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ! मेरी तरफ से पिताजी ने भी माफ़ी मांग ली, लेकिन किशोर चाचा नहीं माने, रट लगाये रहे “एक महाज्ञानी की वजह से देश की हवा कैसे बदल सकती है?”
उन्होंने खाना पीना त्याग दिया, लोगो से बात करना बंद कर दिया और मैने अपराधबोध में घर से धीरे धीरे निकलना ही बंद कर दिया!!
मुझे अगले दिन दिल्ली वापस जाना था, पिताजी ने कहा “जाओ किशोर चाचा से मिल आओ, हलाकि उन्होंने कल से खाना पीना शुरू कर दिया है, लेकिन शरीर काफी दुर्बल हो गया है, और अपनी प्रवृति के मुताबिक उन्होंने विद्रोह का एक नया तरीका इजाद किया है”
मै उन्हें नहीं मिलना चाहता था, लेकिन आत्मग्लानि के बोझ और उनके विद्रोह के नए तरीके को जानने की इक्षा ने, मेरे कदमो को उनके घर की तरफ मोड़ दिया, धीरे धीरे चलते हुए मै उनके घर तक पंहुचा और मेरी आँखे खुली की खुली रह गई!
“ज्ञानपुर के सर्वज्ञानी कुल के किशोरज्ञान शुक्ल, धोती पहने अपनी खाट पर पश्चिम दिशा की तरफ सर किये हुए लेटे हुए थे” , हवा पूरब से चल रही थी, और उनकी धोती हवा में लहरा कर अपने विद्रोही मालिक का गुणगान कर रही थी! स्वभाव से विद्रोही चाचा अपना विद्रोह कर रहे थे! आसपास उनके चेले-चपाटी “ज्ञान सर्वत्र है" का नारा लगा रहे थे! चारो तरफ धुँआ ही धुँआ...
खैर अब तो मै दिल्ली आ चूका हूँ, लेकिन अगर आप “ज्ञानपुर” जाएँ, तो किशोर जी के दर्शन जरुर करें! शायद हवा ने अपना रुख बदल लिया हो? या धोती को अपने मालिक का ख्याल आ गया हो ? या सर्वज्ञानी कुल के होनहार बच्चों या चेलों ने उनकी खाट के पास, हमेशा के लिए पंखो का इन्तेजाम ही कर दिया हो...!!!