Monday, October 20, 2014



ईमान का बटुआ

लो भैया ईमान का बटुआ,खाली-गन्दा, पर, काम का बटुआ

तेरा हो तो सोने जैसा, उसका हो तो खोटी चवन्नी...
काम लगे तो गिरवी रखना, दाम लगे, मुहमांगी कीमत...
सोना-चांदी सदियों पहले, गाँधी का अब नाम है बटुआ...
लो भैया ईमान का बटुआ,खाली-गन्दा, पर, काम का बटुआ

पन्हेरी के पान का चुना, टपके मुह से मिसरी मीठी...
अनमोल बड़ा इंसान का चुना, छन-छन उबले पानी जैसा, 
घुट गई बोली, गूंगी चीखे, चमड़े का ही दाम है बटुआ...
लो भैया ईमान का बटुआ,खाली-गन्दा, पर, काम का बटुआ

जूता चमके, फूटी एड़ी, देसी बढ़िया टोपी, उजली धोती...
बाबा के कमरे से अपने, खोज-खोज के भरना झोली...
 गुल्लक फोड के इसमें ठुसो, बहुत बड़ा आराम है बटुआ...
लो भैया ईमान का बटुआ,खाली-गन्दा, पर, काम का बटुआ


Friday, March 28, 2014

                                       कौवों के शहर में...
                                                                 आशुतोष तिवारी

अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...
काँव-काँव में निकल जाता है दिन,
और रात को चैन की नींद नहीं आती...

किसी लाश के लोथड़े को, दांतों में बंद कर,
लेकर पहुच जाते हैं, मंदिर-मस्जिद के गुम्बद पर...
नोचा-नोची में एक से सौ हों जाते,
और उस उंचाई तक हमारी नज़र नहीं जाती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...

कहाँ-कहाँ कूदा, किस-किस जगह गिराया,
दो बूंद खून का, जो था कही से लाया...
कितने मुह में लगे है दाग? एक लाश के रहम से,
फिर भी कही से देखे, अब बदबू नहीं आती...
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...

बहुतों पर गिरी हड्डियां, बहुतों पर पड़े  छीटे,
किसी ने कौवे को ऊपर घुरा, डाली नज़र, किसी ने निचे..
खैर, उस वक़्त जो पहल सब मिल कर किये होते,
मिट जाते दाग कच्चे, न कपड़ों की सूरत ख़राब होती....
अब तो कौवों ने घेर लिया है पुरे शहर को,
कोयल की मीठी आवाज़ नहीं आती...