राही
शायद रात अब बूढी हो गई है, उसे एक सहारा चाहिए,
बाँह थाम कर, चलती है, किनारे कही गुम हो जाती है!
इस दरिया में कभी डूब गया होगा, उसका अपना कोई,
ढूंढती है, नहीं मिलता, फिर भी पाबन्द से मुहब्बत निभा रही है!!
आशुतोष तिवारी
दोस्त तुम कहाँ हो?
अँधेरी रात का कोना या तुम्हारे हाथ की उंगलियां,
थाम कर चलना या रुकना, और सुबह का मिल जाना।
उँगलियों में उलझे, कभी तल्ख़ सवालों के गुच्छे,
पकड़ ढीली या ज़ोर होना, और हर बात का सुलझ जाना।।
कदमों के सुर दे जाते, हवा की चाल का लेखा
धूल की रंगोली बनाकर, वक़्त से पहले पहुँच जाना।
खाली सड़को पर पैरों को मिला कर चलना या रुकना,
हलकी आह पर, नज़र का मिलना और दर्द का गायब हो जाना।।
कल भी तुम मिले थे, वही शरीर, वही चेहरा ओढ़े,
उंगलियां अब सख्त, और थोड़ी जलने लगती है तुम्हारी
पैरो से मोज़े नहीं उतारते, छालों का अनुमान नहीं होता
हर बार अलग रंग के मोज़े पहन कर आते हो दोस्त,
चलो फिर से मोज़े निकाल भागते है, दोस्त तुम कहाँ हो?