In the darkest of night...far away a star twinkles
Sunday, August 28, 2016
राही
राही
शायद रात अब बूढी हो गई है, उसे एक सहारा चाहिए,
बाँह थाम कर, चलती है, किनारे कही गुम हो जाती है!
इस दरिया में कभी डूब गया होगा, उसका अपना कोई,
ढूंढती है, नहीं मिलता, फिर भी पाबन्द से मुहब्बत निभा रही है!!
आशुतोष तिवारी
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