Wednesday, September 28, 2016

सिंधु का पानी



कुलकर्णी साहब के पास पीएचडी की डिग्री के साथ साथ, एक रौबदार व्यक्तित्व और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने का अभ्यास है, इसलिए हमारे बहुभाषीय मोहल्ले में, उनकी बहुत इज्ज़त है! उनकी कार की सफाई करने वाला 15 साल का चंदू भी, उन्हें अंग्रेजी में ही “Good Morning” कहता है, और जब कुलकर्णी साहब मुस्करा कर चंदू को जवाब देते है, खुश होकर चंदू कार के साथ साथ कुलकर्णी साहब के 8 साल के बेटे की सायकल फ्री में साफ़ कर देता है!!

खैर कुलकर्णी साहब को मिटटी के आलावा हर चीज़ से प्रेम है, घर से निकलते, तो अपने-आप को “जिन्न की सिल्क वाली बोतल” में कैद कर लेते हैं, आँखों पर बड़े-बड़े रौशनदान लगा लेते है, ताकि पड़ोस में रहने वाली नाक को हवा मिलती रहे!! कुलकर्णी साहब धर्म में विश्वास नहीं करते, लेकिन उन्हें हिन्दू होने की संतुष्टि है, क्योकि परम्परा के अनुसार उनके मृत शरीर को मिटटी के नहीं आग के हवाले किया जाएगा!!

साहब का मानना है की मिटटी फेफड़े के लिए हानिकारक हैं, इसलिए अपने बेटे को बगल वाले पार्क में खेलने नहीं देते, वहाँ मिटटी नहीं है, लेकिन हाफ पैन्ट और बनियान पहने छोटे बच्चे आते है, जिनके शरीर पर कपडे कम और मिटटी ज्यादा होती है, जिसे कुलकर्णी साहब अंग्रेजी में “एलर्जिक मिटटी” कहते है! इन बच्चो के लिए कुलकर्णी साहब के पिताजी ने एक NGO खोला था, जिसकी कमाई आज भी कुलकर्णी साहब और उनके दोनों भाई खाते हैं और सरकार के ऊपर धौंस जमाते हैं!

आज सुबह-सुबह कुलकर्णी साहब तैयार हो रहे थे, उनकी धर्म पत्नी ने आकर उलाहना की “की उनकी नौकरानी के पति (चंदू का बाप) को पुलिस ने चोरी के जुर्म में हवालात में बंद कर दिया है, इसलिए वो आज काम पर नहीं आएगी”! थोड़ी देर सोचने के बाद कुलकर्णी साहब ने कहा, मै दिन का खाना ड्राईवर के हाथो, समारोह से भिजवा दूंगा लेकिन तुम इन दोनों “माँ-बेटे” पर नज़र रखना!

धर्म परायण पत्नी ने गर्दन हिलाई तभी नीचे से आवाज़ आई “कुलकर्णी साहब जल्दी चलिए, वरना अगर फिर धमाके हो गए, तो ये शांति-वार्ता महीने दो महीने के लिए स्थगित हो जायेगी”!! जल्दी-जल्दी जिन्न की बोतल ओढ़े, रौशनदान चढ़ाये निर्मल ह्रदय कुलकर्णी साहब घर से निकल गए!! कुलकर्णी साहब समाज सेवी है और आज उन्हें “पाकिस्तान की मिटटी के लिए सिन्धु का पानी” के महत्व पर भाषण देने जाना है!




Monday, September 12, 2016

धागे

                      धागे
वक़्त की कमीज़ से, जेब, और एक बाँह निकल चुकी है,
दाहिने कंधे से, जहाँ पर तुमने, सर रखा था! शायद?
आज फिर हाथ में, एक धागा गया!
नया है, पता नहीं किस ओर से उखड़ा है?
थोड़े और धागे हों, तो ठिकाना पता चले!

टेबल पर, तुम्हारा दिया हुआ सफ़ेद रुमाल,
आज भी पड़ा हैलाल रंग का फूल बना हुआ!
सिर्फ दो रंग से जीवन कैसे चलता?
और जेब भी नहीं है, कहाँ रखूँगा संभाल कर?

टेबल पर है बरसो से, हवा नहीं चलती, दीमक नहीं लगते,
धागे उसी पर रख देता हूँ! बटन बंद हैं अब भी,
एक-दो बटन खुलने दो, थोड़ी हवा लगने दो सीने में!
किसी दरजी से कहूँगा, धागे जोड़ देगा रुमाल में!

मेरी कमीज में लाल और सफ़ेद रंग नहीं है!!