Monday, September 12, 2016

धागे

                      धागे
वक़्त की कमीज़ से, जेब, और एक बाँह निकल चुकी है,
दाहिने कंधे से, जहाँ पर तुमने, सर रखा था! शायद?
आज फिर हाथ में, एक धागा गया!
नया है, पता नहीं किस ओर से उखड़ा है?
थोड़े और धागे हों, तो ठिकाना पता चले!

टेबल पर, तुम्हारा दिया हुआ सफ़ेद रुमाल,
आज भी पड़ा हैलाल रंग का फूल बना हुआ!
सिर्फ दो रंग से जीवन कैसे चलता?
और जेब भी नहीं है, कहाँ रखूँगा संभाल कर?

टेबल पर है बरसो से, हवा नहीं चलती, दीमक नहीं लगते,
धागे उसी पर रख देता हूँ! बटन बंद हैं अब भी,
एक-दो बटन खुलने दो, थोड़ी हवा लगने दो सीने में!
किसी दरजी से कहूँगा, धागे जोड़ देगा रुमाल में!

मेरी कमीज में लाल और सफ़ेद रंग नहीं है!!




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