Tuesday, November 22, 2016

दो किनारों की दास्ताँ



सुनो, तुम्हे दो किनारो की एक दास्ताँ सुनाता हूँ।
उम्र से पहले जो ढल गया, किस्सों से भी आगे निकल गया
तेज ख़ामोशी का दरिया, जिन दो किनारों को निगल गया।
एक किनारा, आज नदी के बीच से, चुपचाप पुकारता हैं।
नम रेतों के फासले पर, दूसरा, बिना सुने मुस्कराता है।
वही एक, चांदनी रात में चाँद को अपने हाथो से नहलाता है,
एक लहर पर परछाई रख, तारो में लिपटा चाँद बढ़ाता है।
शायद उस चाँद को देख दूसरे की चंचलता वापिस आ जाए,
उलझती बुनती कहानियों में, कोई शब्द होठो पर आ जाए।
बुझी हँसी भी पूरी नहीं होती, कोई कश्ती सतह से गुजर जाती है,
मोतियाँ गोद में छुपा लेती है, पर एक सीप, उस एक को मिल जाती है।
कई सालो का इतिहास, एक पल मे, गुज़रे पल का हो जाता है,
अचानक तूफ़ान शांत नदी के सीने से उबल पड़ता है
दूर थे पर एक रिश्ता तो था, यही आज किनारों को बतलाता है,
दर्द फासले का नहीं, गुमनामी का है, अपनी जिंदगी सुनाता है।
कल रात डूबते वक़्त मिल गया था एक किनारा मुझको,
अपने हाथो की उँगलियों से दोनों को मिलाने की कोशिश करता हूँ।
सुनो, तुम्हे दो किनारो की एक दास्ताँ सुनाता हूँ।
आशुतोष तिवारी

Thursday, October 6, 2016

रावण का आत्मदाह

हर साल की तरह, इस साल भी रावण का पुतला बनाया गया! रावन दहन से 2 दिन पहले, तय समय पर भरे बाज़ार में रावण को रस्सियों से बाँध कर लटका दिया गया! 2 दिन और 2 रात, बेचारा अकेला रावण! खैर, रात में रावण, ठंढ की वजह से ठिठुर रहा था, ठीक उसी समय शर्मा जी का बेटा वहाँ से गुजरा, हाथ में अभी भी बोतल पड़ी थी! गाना गाते-गाते, रावण को देखकर अचानक रुक गया! फिर ऐसा जोरदार ठहाका लगाया, की रावण के बीस कान सकते में आ गए! रावण डर गया! शर्मा जी के बेटे को आज घर जाने की इक्षा नहीं हुई, गाली ही तो देनी है! बीबी से बड़ा राक्षस सामने खड़ा है, और इसको गाली देने पर पोलिस अन्दर भी नहीं ले जायेगी, “फुल प्रूफ लीगल हरासमेंट”!!
बड़े इत्मिनान से बोतल लेकर शर्मा जी, वहीँ रावण के चरणों में बैठ गए! पहले से डरा रावण, अपने चरणों में शर्मा जी को देखकर भूलवश लक्ष्मण समझ बैठा! और अनहोनी के डर से खुद ही झुककर उनके सामने बैठ गया! रावण ने बोतल देखी, उसे लगा संजीविनी बूटी पीस कर हनुमान जी ने दे दी होगी! जब कही प्रॉब्लम आये दो घूंट पी लीजिएगा! बहुत देर तक सर झुकाए रावण को देखकर, शर्मा जी के बेटे ने ही बात आगे बढाई!
शर्मा जी: क्यों बे रावण? साले, औकात पता चल गई? आज यहाँ खड़ा है, दो दिन बाद तुझे जला दिया जायेगा, और तू कुछ नहीं कर सकता, हा हा हा! सारी हेकड़ी निकल गई! कहाँ गई तेरी ताक़त?
रावण: लेकिन लक्ष्मण, मैंने तो 10 लाख साल पहले अपराध किया था! उसकी सजा आज क्यों मिल रही रही है?
शर्मा जी: चुप, अपराध, अपराध होता है और ये हमारे कलयुग का पर्सनल मैटर है! हम 10 दिन में जस्टिस करें या 10 लाख साल में! तू चुपचाप बंधा रह!
हिम्मत कर के रावण ने दूसरा सवाल पूछा!
रावण: लेकिन, पिछले साल भी तो जलाया था! कितनी बार जलाओगे एक ही इंसान को?
शर्मा जी के बेटे ने बोतल मुंह से लगा कर, एक लम्बी सीप मारी और  गुस्से में चिल्लाया!
शर्मा जी: शट-अप, इंसान नहीं राक्षस! हम इंसान हैं तुम राक्षस हो! और, हमारी मर्जी, हम हर साल केस reopen करेंगे! तुम्हे क्या?
रावण का सारा ज्ञान धरा रह गया, संजीवनी पिए हुए शर्मा जी के बेटे से कैसे जीतता! दशमी तक रोज शर्मा जी के सुपुत्र आते और रावण को गाली दे कर चले जाते! उधर शर्मा जी के घरवाले भी खुश है, नवरात्री में माता ने सुन लिया है, अब बेटा घर पर आकर बीबी को गाली नहीं देता, मारता नहीं!!
खैर रावण-दहन के ठीक पहले, सारे लोग जमा हो गए! बच्चे, बुड्डे, औरतें सब रावण की तरफ देख रहे हैं! एक साथ इतनी नज़रों को घूरते देख रावण शरमा गया! लोग हंसने लगे! फिर अचानक किसी ने रावण के अन्दर प्राण प्रतिष्ठा कर दी, रावण गायब!
एक कमरे में राम-लक्ष्मण का पार्ट करने वाले, दो बच्चों का मेकअप हो रहा है! आवाज़ वहाँ भी पहुची-रावण गायब! लक्ष्मण बने लड़के ने देख लिया, की रावण तकिये के पीछे छिपकर कुछ इशारा कर रहा है! लक्ष्मण ने फटाफट कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और तकिया के पीछे छुपे रावण को पकड़ कर बाहर निकाला! रावण उदास था, बच्चे ने उससे उदासी का कारण पूछा!
रावण: मुझे असली राम के हाथो मरना है!
लक्ष्मण: लेकिन तुम तो नकली हो!
रावण: नहीं, मैं नकली नहीं हूँ, मै असली हूँ!
रावण जिद पर अड़ गया की उसे राम ही मार सकतें हैं! आसपास हडकंप मच गई की “रावण राम की डिमांड कर रहा है और वो भी ओरिजिनल”! ज्ञानी का ज्ञान फेल, करें तो क्या करें! किसी ने सलाह दी, “रावण, असली नहीं बल्कि बुराई का प्रतिक है” इसलिए “राम, अच्छाई के प्रतिक होंगे”! अब पूरा शहर अच्छे इंसान की तलाश में निकल गया! घर-घर ढूँढा गया, लेकिन अच्छा इंसान? बड़ी मुश्किल से 4 लोगों को पकड़ कर रावण के सामने लाया गया! कलयुग के लोकतंत्र की बात थी, रावण के मूलभूत अधिकारों की बात थी, इसलिए उसे स्वेक्षा से राम चुनने का अवसर दिया गया! एक बुजुर्ग ने रावण से चारो का परिचय करवाया!
बुजुर्ग: ये पंडित ज्ञानोदय शास्त्री, संस्कृत और हिंदी से PHD हैं!
रावण: इनसे पूछिये, की इनका बेटा क्या करता है? क्या उसका, किसी पराई स्त्री से कोई सम्बन्ध है?
ज्ञानोदय जी सकते में आ गए, कहाँ अच्छाई का प्रतिक बन कर आये थे, और यहाँ उनकी इज्ज़त उतारी जाने
लगी! गुस्से में बोले!
ज्ञानोदय: लेकिन मेरे बेटे के कर्मो से मेरी अच्छाई कैसे कम हो गई?
रावण: लेकिन, मेरे राम ने तो अपने पिता के वचन के लिए 14 साल वनवास काट दिए थे!
समय बीता जा रहा था, रावण-दहन का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था, लोग बेचैन हो रहे थे! बुजुर्ग ने फटाफट अगला परिचय करवाया!
बुजुर्ग: अच्छा ठीक है, इनसे मिलिए हमारे दुसरे राम, श्री बालकृष्ण गुप्ता! इनकी शादी नहीं हुई, बचपन से ब्रह्मचारी है!
रावण: लेकिन इन्होने तो अपने भाभी का अपमान किया है! पुरे मोहल्ले के सामने, लोग इनकी भाभी को गाली दे रहे थे और ये चुपचाप तमाशा देख रहे थे! मेरे राम तो इतने कमज़ोर नहीं थे?
सारे लोग परेशान, रावण के पास सबके प्रश्नों का जवाब था! चारो के चारो कलयुगी राम फेल हो गए है! पहली बार एक राक्षस के सामने कलयुग के इंसान ठंढे पड़ गए है! बाहर शोर बढ़ता जा रहा है! “रावण को लाओ रावण को लाओ” लेकिन रावण जाने को तैयार नहीं!
सारे लोग मुह लटका कर चले गए! राम-लक्ष्मण बने बच्चे मायूसी से कमरे में अपने-अपने ड्रेस उतारने लगे! 6 साल के लक्ष्मण की आँखों से आंसू आ गए, उसने बड़ी जिद करके अपनी माँ से लक्ष्मण की ड्रेस सिलवाई थी!लक्ष्मण: हर साल दुसरे के हाथ से मर जाते हो, आज हमारी बारी आई तो नाटक कर दिया?
एक बच्चे की, आंसू की वजह से रावण लज्जित हो गया! उसने सोचा “हर साल तो जलता ही हूँ, एक साल और सही’! रावण ने सहमती में गर्दन हिला दी!! उसे समझ आ गया है, की वो बच्चो को रोमांचित करने वाला, महज एक कठपुतली है!
निराश भीड़ में एकबार फिर उर्जा भर गई, लोग चिल्ला रहे हैं “रावण मरने के लिए रेडी हो गया है”! बच्चे-बुड्डे सब रावण के इंतज़ार में हैं! अचानक रावण अपनी जगह पर बंधा हुआ दिखा! सर लटकाए हुए! लेकिन आँखों में छल-गुस्सा-अहंकार नहीं बल्कि आंसू लिए हुए!
राम ने तीर चलाई, धू-धू करके रावण जल गया!! लोगों में उल्लास भर गया! “रावण मारा गया, रावण मारा गया”! निश्चिंत होकर मै भी घर लौट आया! अगली सुबह “राम-राज्य” में होगी, इसी आशा के साथ मै सो गया!
अभी भी सो रहा हूँ, रामराज्य आ जाये तो जगा दीजिएगा!
आशुतोष तिवारी

Wednesday, September 28, 2016

सिंधु का पानी



कुलकर्णी साहब के पास पीएचडी की डिग्री के साथ साथ, एक रौबदार व्यक्तित्व और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने का अभ्यास है, इसलिए हमारे बहुभाषीय मोहल्ले में, उनकी बहुत इज्ज़त है! उनकी कार की सफाई करने वाला 15 साल का चंदू भी, उन्हें अंग्रेजी में ही “Good Morning” कहता है, और जब कुलकर्णी साहब मुस्करा कर चंदू को जवाब देते है, खुश होकर चंदू कार के साथ साथ कुलकर्णी साहब के 8 साल के बेटे की सायकल फ्री में साफ़ कर देता है!!

खैर कुलकर्णी साहब को मिटटी के आलावा हर चीज़ से प्रेम है, घर से निकलते, तो अपने-आप को “जिन्न की सिल्क वाली बोतल” में कैद कर लेते हैं, आँखों पर बड़े-बड़े रौशनदान लगा लेते है, ताकि पड़ोस में रहने वाली नाक को हवा मिलती रहे!! कुलकर्णी साहब धर्म में विश्वास नहीं करते, लेकिन उन्हें हिन्दू होने की संतुष्टि है, क्योकि परम्परा के अनुसार उनके मृत शरीर को मिटटी के नहीं आग के हवाले किया जाएगा!!

साहब का मानना है की मिटटी फेफड़े के लिए हानिकारक हैं, इसलिए अपने बेटे को बगल वाले पार्क में खेलने नहीं देते, वहाँ मिटटी नहीं है, लेकिन हाफ पैन्ट और बनियान पहने छोटे बच्चे आते है, जिनके शरीर पर कपडे कम और मिटटी ज्यादा होती है, जिसे कुलकर्णी साहब अंग्रेजी में “एलर्जिक मिटटी” कहते है! इन बच्चो के लिए कुलकर्णी साहब के पिताजी ने एक NGO खोला था, जिसकी कमाई आज भी कुलकर्णी साहब और उनके दोनों भाई खाते हैं और सरकार के ऊपर धौंस जमाते हैं!

आज सुबह-सुबह कुलकर्णी साहब तैयार हो रहे थे, उनकी धर्म पत्नी ने आकर उलाहना की “की उनकी नौकरानी के पति (चंदू का बाप) को पुलिस ने चोरी के जुर्म में हवालात में बंद कर दिया है, इसलिए वो आज काम पर नहीं आएगी”! थोड़ी देर सोचने के बाद कुलकर्णी साहब ने कहा, मै दिन का खाना ड्राईवर के हाथो, समारोह से भिजवा दूंगा लेकिन तुम इन दोनों “माँ-बेटे” पर नज़र रखना!

धर्म परायण पत्नी ने गर्दन हिलाई तभी नीचे से आवाज़ आई “कुलकर्णी साहब जल्दी चलिए, वरना अगर फिर धमाके हो गए, तो ये शांति-वार्ता महीने दो महीने के लिए स्थगित हो जायेगी”!! जल्दी-जल्दी जिन्न की बोतल ओढ़े, रौशनदान चढ़ाये निर्मल ह्रदय कुलकर्णी साहब घर से निकल गए!! कुलकर्णी साहब समाज सेवी है और आज उन्हें “पाकिस्तान की मिटटी के लिए सिन्धु का पानी” के महत्व पर भाषण देने जाना है!




Monday, September 12, 2016

धागे

                      धागे
वक़्त की कमीज़ से, जेब, और एक बाँह निकल चुकी है,
दाहिने कंधे से, जहाँ पर तुमने, सर रखा था! शायद?
आज फिर हाथ में, एक धागा गया!
नया है, पता नहीं किस ओर से उखड़ा है?
थोड़े और धागे हों, तो ठिकाना पता चले!

टेबल पर, तुम्हारा दिया हुआ सफ़ेद रुमाल,
आज भी पड़ा हैलाल रंग का फूल बना हुआ!
सिर्फ दो रंग से जीवन कैसे चलता?
और जेब भी नहीं है, कहाँ रखूँगा संभाल कर?

टेबल पर है बरसो से, हवा नहीं चलती, दीमक नहीं लगते,
धागे उसी पर रख देता हूँ! बटन बंद हैं अब भी,
एक-दो बटन खुलने दो, थोड़ी हवा लगने दो सीने में!
किसी दरजी से कहूँगा, धागे जोड़ देगा रुमाल में!

मेरी कमीज में लाल और सफ़ेद रंग नहीं है!!




Sunday, August 28, 2016

राही


                              राही
शायद रात अब बूढी हो गई है, उसे एक सहारा चाहिए,
बाँह थाम कर, चलती है, किनारे कही गुम हो जाती है!
इस दरिया में कभी डूब गया होगा, उसका अपना कोई,
ढूंढती है, नहीं मिलता, फिर भी पाबन्द से मुहब्बत निभा रही है!!
आशुतोष तिवारी

Sunday, August 7, 2016

दोस्त तुम कहाँ हो?

                     दोस्त तुम कहाँ हो?

अँधेरी रात का कोना या तुम्हारे हाथ की उंगलियां,
थाम कर चलना या रुकना, और सुबह का मिल जाना।
उँगलियों में उलझे, कभी तल्ख़ सवालों के गुच्छे,
पकड़ ढीली या ज़ोर होना, और हर बात का सुलझ जाना।।

कदमों के सुर दे जाते, हवा की चाल का लेखा
धूल की रंगोली बनाकर, वक़्त से पहले पहुँच जाना।
खाली सड़को पर पैरों को मिला कर चलना या रुकना,
हलकी आह पर, नज़र का मिलना और दर्द का गायब हो जाना।।

कल भी तुम मिले थे, वही शरीर, वही चेहरा ओढ़े,
उंगलियां अब सख्त, और थोड़ी जलने लगती है तुम्हारी
पैरो से मोज़े नहीं उतारते, छालों का अनुमान नहीं होता
हर बार अलग रंग के मोज़े पहन कर आते हो दोस्त,

चलो फिर से मोज़े निकाल भागते है, दोस्त तुम कहाँ हो?








Monday, March 21, 2016

सर्वज्ञानी का विद्रोह

सर्वज्ञानी का विद्रोह
आशुतोष तिवारी
भोपाल से चालीस किलोमीटर दूर मेरा गाँव है, ”ज्ञानपुर”! मेरे गाँव में सन 1947 के बाद सिर्फ दो तरह के ही लोग पैदा हुए!एक महाज्ञानी एक सर्वज्ञानी, हलाकि महाज्ञानी लोगों को गाँव में अछि प्रतिष्ठा हासिल नहीं थी, इसलिए वो गाँव से पलायन कर गए और दिल्ली, आगरा, इंदौर जैसे शहरों में अपनी पत्रकारिता की दूकान खोल ली, आज भी इन शहरो की आधी से ज्यादा जनसख्या हमारे गाँव वालों की ही है, जो रिश्ते में मेरे चाचा, मामा, भाई या भतीजे लगते है! भाई, चाचा की लिखी पुस्तकों का तार्किक अध्यन कर के नए सिरे से लिखता है और भतीजा, भाई की लिखी हुई किताबों की समीक्षा कर, किसी जाने माने नेता से विमोचन करवाता है! ले दे के किताबें वही है, आज़ादी के पहले वाली, जो अंग्रेजो की कलम से, उनकी हवेलियों में, विदेशी शराब और बालाओं को चुमते हुए ज्ञानपुर के अखंड ज्ञानियों ने लिखी थी! 
गाँव की बागडोर सर्वज्ञानी लोगों के हाथ में रह गई, जो न ईश्वर को मानते थे, न मनुष्य को! उनकी नज़र में सब बराबर थे! इश्वर, मनुष्य, जानवर! और सबसे दिलचस्प बात ये थी, की इन तीनो को नियंत्रित करने का अधिकार सिर्फ मनुष्य को था! वो ईश्वर को भी कंट्रोल करते थे और जानवर को भी कंट्रोल करते थे और सर्वज्ञानी होने की वजह से महाज्ञानी और अल्पज्ञानी मनुष्यों पर भी नियंत्रण रखते थे! 
सर्वज्ञानी खानदान की नीवं सन 1850 में श्री ज्ञानेश्वर शुक्ल ने रखी थी! जिनकी मान्यता ये थी की संसार में सिर्फ ज्ञानी हैं या मूढ़! इसलिए हर बात को तर्क की कसौटी पर कसे बिना नहीं माना जा सकता, और तर्क की कसौटी पर खरा उतरने के लिए सबसे आवश्यक था, की उनके द्वारा खिची हुई चिल्लम, के धुएं को पार करना! धुएं के एक तरफ उनके चेले-चपाटी रहते, जो धुएं की सुगंध से ही तीनो लोकों का दर्शन कर आते, और धुएं की दूसरी तरफ होते अल्पज्ञानी या मूढ़ जिन्हें धुएं का असर ऐसा होता की वो अपनी वास्तविक बात भूलकर धुएं के क्षेत्र में ही घुमते हुए नतमस्तक हो जाते!
धुएं की खुशबु और खानदान की नीवं रखने के बोध ने उन्हें विद्रोही प्रवृति का बना दिया! समय बदला, ज्ञान बदला, गाँव बदला, सरकार बदली लेकिन सर्वज्ञानी परिवार के लोग न बदले! आज भी ज्ञानपुर में देश के किसी हिस्से से लाये गए अखबार, पत्रिका या अन्य लेख मान्य नहीं है! गलती से अगर प्रकाशक, लेखक, या विमोचक “महाज्ञानी” कुल का हुआ (यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित रहेगा, की जिस सर्वज्ञानी कुल के लड़के या लड़की ने महाज्ञानीयों के घर विवाह किया उनका कुल भी महाज्ञानी ही माना जाता है.. यानी की सर्वज्ञानियों की दृष्टि में अछूत)तो उस पुस्तक को ज्ञानपुर में लाना एक हत्या के बराबर माना जाता है!
आज सर्वज्ञानी परिवार की बागडोर किशोरज्ञान शुक्ल के हाथो में है! जिनके कहे हुए शब्द ज्ञानपुर के लोग सुने बिना ही स्वीकार कर लेते है! 
इस बार घर जाते समय मै भूलवश अपने साथ एक अखबार लेता गया! मुझे याद ही नहीं रहा की मेरे गाँव में इसकी सजा के तौर पर मुझे अछूत घोषित किया जा सकता है! खैर शाम को घर पंहुचा, खाना खाया और लेट गया! सुबह आँख खुली तो घर के बाहर हंगामा हो रहा था! मै समझ नहीं पाया की आखिर क्या हो गया, उत्सुकतावश बाहर निकला तो देखा, की किशोरज्ञान चाचा, मेरे पिताजी से उलझे हुए थे!
मैंने किशोर ज्ञान जी से पूछा “आखिर माजरा क्या है?”
तो उनके अन्दर का सर्वज्ञानी खून खौल गया! मेरे हाथो में अखबार थमाते हुए बोले!”ये क्या है”? 
अचानक ही मेरे मष्तिस्क में मेरे कुकर्म का बोध हो गया! मैंने उनसे माफ़ी मांगी, लेकिन वो गुस्से में मेरी बात सुने बिना बोले जा रहे थे, आखिर में पिता जी ने मेरे हाथो में अखबार थमाया और उन शब्दों को दिखाया जो सर्वज्ञानी खानदान को नागवार गुजरा था!! 
अखबार 26 मई 2014 का था और शीर्षक था!”देश की हवा बदली”! और इस लेख को लिखा था! महाज्ञानी परिवार के एक अल्पज्ञानी ने! भला देश की हवा एक अछूत कुल का महाज्ञानी कैसे बदल सकता है?
मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ! मेरी तरफ से पिताजी ने भी माफ़ी मांग ली, लेकिन किशोर चाचा नहीं माने, रट लगाये रहे “एक महाज्ञानी की वजह से देश की हवा कैसे बदल सकती है?” 
उन्होंने खाना पीना त्याग दिया, लोगो से बात करना बंद कर दिया और मैने अपराधबोध में घर से धीरे धीरे निकलना ही बंद कर दिया!!
मुझे अगले दिन दिल्ली वापस जाना था, पिताजी ने कहा “जाओ किशोर चाचा से मिल आओ, हलाकि उन्होंने कल से खाना पीना शुरू कर दिया है, लेकिन शरीर काफी दुर्बल हो गया है, और अपनी प्रवृति के मुताबिक उन्होंने विद्रोह का एक नया तरीका इजाद किया है”
मै उन्हें नहीं मिलना चाहता था, लेकिन आत्मग्लानि के बोझ और उनके विद्रोह के नए तरीके को जानने की इक्षा ने, मेरे कदमो को उनके घर की तरफ मोड़ दिया, धीरे धीरे चलते हुए मै उनके घर तक पंहुचा और मेरी आँखे खुली की खुली रह गई!
“ज्ञानपुर के सर्वज्ञानी कुल के किशोरज्ञान शुक्ल, धोती पहने अपनी खाट पर पश्चिम दिशा की तरफ सर किये हुए लेटे हुए थे” , हवा पूरब से चल रही थी, और उनकी धोती हवा में लहरा कर अपने विद्रोही मालिक का गुणगान कर रही थी! स्वभाव से विद्रोही चाचा अपना विद्रोह कर रहे थे! आसपास उनके चेले-चपाटी “ज्ञान सर्वत्र है" का नारा लगा रहे थे! चारो तरफ धुँआ ही धुँआ...
खैर अब तो मै दिल्ली आ चूका हूँ, लेकिन अगर आप “ज्ञानपुर” जाएँ, तो किशोर जी के दर्शन जरुर करें! शायद हवा ने अपना रुख बदल लिया हो? या धोती को अपने मालिक का ख्याल आ गया हो ? या सर्वज्ञानी कुल के होनहार बच्चों या चेलों ने उनकी खाट के पास, हमेशा के लिए पंखो का इन्तेजाम ही कर दिया हो...!!!

Saturday, January 9, 2016

मैंने क्या देखा है..?


भूखा रह कर भी खुदा को खिलाते देखा है,
हाथ में जुगनू लेकर दिन को बुझाते देखा है ...
गरीब की सिसकियाँ तो कुछ लम्हों का सवाल रही
जवाब को उम्र भर गरीबों को रुलाते देखा है ...

नमाज़ी हाथो के छूने से, पाक होती कभी रूहें
उन्ही हाथो से, काफिरों को जलाते देखा है...
बड़े प्यार से कहते थे कभी "वसुधैव कुटुंबकम"
उन होठों को "बलि इंसान की देंगे" चिल्लाते देखा है
हाथ में जुगनू लेकर दिन को बुझाते देखा है ...

सवाल ये भी है की खुदा सिर्फ मर्दों का तो नहीं ?
शायद इसलिए की औरतों को कम लड़ते देखा है...
मेरे मोहल्ले में हँसते थे, अलग मजहब के कई बच्चे,
आज, अपनी बिरादरी में, उन्हें घर लेते देखा है...
हाथ में जुगनू लेकर दिन को बुझाते देखा है ...